⚜️बोधकथा - हाथी और दस अंधे⚜️
एक बार एक गांव में एक हाथी आया। उसे देखने के लिये छोटे-बड़े सब इकठ्ठा हुए।
हर कोई हाथी की चर्चा करने लगा। उस गांव में दस अंधे रहते थे। उन्होंने सोचा, चलो हम भी हाथी “देखें”।
लोग उन्हें हाथी के पास ले गये।
उन्होंने हाथी के शरीर को स्पर्श किया।
जिसने पैर पर से हाथ फेरा था वह कहने लगा “हाथी खंबे जैसा है।”
जिसने पूंछ थामी थी, वह कहने लगा कि “अरे, हाथी तो मोटे रस्से जैसा है।”
तीसरे ने हाथी का कान पकड़ा था।
वह कहने लगा कि “हाथी माने क्या एक प्रकार का सूप ही समझे”।
जिसने हाथी के पीठ पर से हाथ फेरा था, उसने घोषित किया कि, “हाथी दीवार जैसा होता है।”
इस प्रकार वे सब अपनी अनुभूति के अनुसार सावेश प्रतिपादन करने लगे।
उनमें बड़ा वादविवाद छिड़ा। अन्त में एक देखनेवाले व्यक्ति ने उन्हें समझाया, “अरे, तुमने तो केवल एकही अवयव को स्पर्श किया था।
उसे ही तुम संपूर्ण मान रहे हो।
यह सब मिलाकर, उस में और भी अधिक कुछ जोडेंगे, तब कहीं हाथी का पूरा वर्णन होगा।”
सत्य को पहचानिये
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