⚜️बोधकथा - शान्ति-सुख⚜️
मिट्टी के टीले पर बैठे हुए संत अनाम अस्ताचलगामी भगवान् सूर्य को बड़े ध्यान से देख रहे थे। वे देख रहे थे, किस प्रकार एक दिन महाशक्तियों का वैभव नष्ट हो जाता है।संत अनाम इन्हीं विचारों में डूबे थे कि एक आदमी उनके समीप आया और प्रणाम कर चुपचाप खड़ा हो गया।
मुसकराते हुए संत अनाम ने पूछा-वत्स मुझ से कुछ काम है?’’
आगंतुक ने विनय की-भगवन् मैं पुरुदेश का धनी सेठ हूँ।
तीर्थयात्रा के लिए चलने लगा तो मेरे एक मित्र ने मुझसे कहा कि आप इतने स्थानों की यात्रा करेंगे कहीं से मेरे लिए शांति, सुख और प्रसन्नता मोल ले आना।
मैंने अनेक स्थानों पर ढूँढ़ा पर यही तीन वस्तुएँ कहीं नहीं मिलीं। आपको अत्यंत शांत, सुखी और प्रसन्न देखकर ही आपके पास आया हूँ, संभव है आपको पास ही वह वस्तुएँ उपलब्ध हो जाएँ।’’
संत अनाम फिर मुस्कराए और अपनी कुटिया के भीतर चले गए।
एक निमिष के उपरांत ही लौटकर आए और एक कागज की पुड़िया देते हुए बोले-यह अपने मित्र को दे देना और हाँ, तब तक इसे कहीं खोलना मत।’’
आगंतुक पुड़िया लेकर चला गया।
मित्र ने एकांत में ले जाकर उसे खोला और उसमें रखी औषधि का सेवन करके कुछ दिन में ही सुखी, शांत और प्रसन्न हो गया।
एक दिन वह धनी सज्जन मित्र के पास जाकर बोले-मित्र मुझे भी अपनी औषधि का कुछ अंश दे दो तो मेरा भी कल्याण हो जाए।’’
मित्र ने पुड़िया खोलकर दिखाई, उसमें लिखा था-अंतःकरण में विवेक और संतोष से ही स्थायी सुख-शांति और प्रसन्नता मिलती है।’’
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